SOBRE LA EMISORA
पहले रेडियो पै रागनी सुणन का बहोत चाव था। पुरे दिन बाट देख्या करते की कब साँझ होगी और कब रागनियां का प्रोग्राम आवेगा। धीरे-धीरे टेम इसा बदल्या की बेरा ए नहीं पाटया। टेम के साथ साथ जिम्मेदारिया का बोझ भी बढ़ता गया और सारे शौक धरे के धरे रहगे। आर इब ना वे रेडियो रहे और ना वो बात। पर रागनी सुणन का चाव इब भी दिल में किते न किते घर करें बैठ्या था। इस्से जूनून ने अंगड़ाई मारी और इसका नतीजा रेडियो धाकड़ आपके सामने है।